शेख हसीना को फांसी की सजा: भारत प्रत्यर्पण से इनकार करेगा या तीसरे देश भेजेगा?

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मौत की सजा मिलते ही दक्षिण एशिया की राजनीति में भूचाल आ गया है। दिल्ली में शरण ले चुकीं हसीना अब भारत के लिए कूटनीतिक चुनौती बन गई हैं—क्या हम उन्हें ढाका सौंपेंगे या फिर नया मोड़ लाएंगे?

शेख हसीना को फांसी की सजा का ऐलान होते ही सवाल उठने लगे कि भारत इस फैसले को कितना मान सकता है। बांग्लादेश की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) ने सोमवार को हसीना समेत तीन लोगों पर फैसला सुनाया, जिसमें हत्या, नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर इल्जाम शामिल हैं। हसीना पिछले साल अगस्त में हिंसक प्रदर्शनों के बीच ढाका छोड़कर भारत पहुंची थीं और तब से दिल्ली के एक सुरक्षित आवास में रह रही हैं। यह सजा न सिर्फ उनकी किस्मत, बल्कि भारत-बांग्लादेश रिश्तों पर भी असर डालेगी।

शेख हसीना को फांसी की सजा: ट्रिब्यूनल ने लगाए कौन से आरोप?

ICT ने शेख हसीना पर पांच प्रमुख आरोप तय किए, जो 2024 के छात्र आंदोलनों से जुड़े हैं। पहला, पुलिस और अवामी लीग कार्यकर्ताओं को प्रदर्शनकारियों पर हमला करने के लिए उकसाने का। दूसरा, घातक हथियारों, हेलीकॉप्टरों और ड्रोनों से हिंसा दबाने का आदेश देने का। तीसरा, बेगम रौकेया यूनिवर्सिटी के छात्र अबू सैयद की हत्या में साजिश रचने का। चौथा, ढाका के चांदकापुल में छह निहत्थे प्रदर्शनकारियों की गोली मारकर हत्या का। और पांचवां, पांच प्रदर्शनकारियों को जिंदा जलाने या लाशें नष्ट करने का।

इनमें से दो मामलों—हत्या उकसाने और आदेश देने के—में हसीना को फांसी हो गई, जबकि बाकी में उम्रकैद। पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान को भी फांसी और पूर्व आईजीपी अब्दुल्ला अल-ममून को पांच साल की सजा मिली। ममून सरकारी गवाह बन चुके थे। कोर्ट ने हसीना और खान की संपत्ति जब्त करने का आदेश भी दिया। फैसला सुनते ही अदालत में तालियां गूंज उठीं, लेकिन हसीना ने इसे ‘कंगारू कोर्ट’ करार दिया।

भारत को बांग्लादेश ट्रिब्यूनल का फैसला मानना पड़ेगा?

2013 की भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि के तहत अपराधी को सौंपना तब संभव जब वह दोनों देशों में अपराध हो, कम से कम एक साल की सजा हो और गिरफ्तारी वारंट मौजूद हो। इसी आधार पर भारत ने 2020 में शेख मुजीबुर्रहमान हत्याकांड के दोषियों को ढाका भेजा था। लेकिन हसीना के मामले में दो रास्ते खुले हैं—राजनीतिक अपराध मानना या ट्रायल की निष्पक्षता पर सवाल उठाना।

संधि के अनुच्छेद 6 के मुताबिक राजनीतिक अपराध पर इनकार संभव, लेकिन हत्या और नरसंहार जैसे गंभीर मामलों को इससे बाहर रखा गया है। फिर भी अनुच्छेद 8 खतरा या अनुचित ट्रायल का हवाला देता है। संयुक्त राष्ट्र ने ICT के गठन, जजों की नियुक्ति और प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। हसीना को वकील न मिलना, सरकारी दबाव की रिपोर्ट्स और 1400 मौतों की जांच पर अंतरराष्ट्रीय चिंता—ये सब भारत के लिए मजबूत आधार हैं। पूर्व राजदूत अजय बिसारिया कहते हैं, “भारत हसीना को कभी नहीं सौंपेगा। उन्होंने राजनीतिक शरण ली है और एशिया में उनकी सुरक्षा यहीं सबसे ज्यादा है।”

विदेश मंत्रालय ने बयान में कहा, “भारत पड़ोसी के रूप में बांग्लादेश की भलाई चाहता है। हम शांति, लोकतंत्र और स्थिरता के लिए हितधारकों के साथ जुड़े रहेंगे।”

प्रत्यर्पण से इनकार के क्या नतीजे?

अगर भारत मना करता है, तो ढाका कूटनीतिक दबाव बढ़ा सकता है—न्याय का सम्मान न करने का आरोप लगाकर। लेकिन रिश्ते टूटना मुश्किल, क्योंकि बांग्लादेश ऊर्जा, व्यापार और सीमा सुरक्षा पर भारत पर निर्भर है। फिर भी तनाव से ‘रणनीतिक बदलाव’ हो सकता है—चीन-पाकिस्तान की नजदीकी बढ़ेगी। हाल ही पाक युद्धपोत का आगमन और यूनुस का ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ नक्शा हाथ में दिखना चेतावनी है। पूर्वोत्तर से बंगाल की खाड़ी तक भारत की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि हसीना को तीसरे देश—जैसे यूएई, ब्रिटेन, कनाडा या नीदरलैंड्स—भेजना सबसे सुरक्षित। इससे सीधा टकराव टल जाएगा।

शेख हसीना का रुख: लौटूंगी, लेकिन शर्तों पर

अगस्त 2024 में हिंसक भीड़ से बचकर भारत आईं हसीना ने ICT को ‘झूठा तमाशा’ कहा। एक इंटरव्यू में बोलीं, “यह राजनीतिक बदला है। मुझे सफाई का मौका न मिला।” ऑडियो संदेश में कहा, “मेरी जिंदगी अल्लाह की देन है।” ICC में केस चलाने की चुनौती भी दी—अगर यूनुस सरकार ईमानदार है तो वहां ले जाओ।

लौटने पर शर्त साफ: निष्पक्ष चुनाव, अवामी लीग पर बैन हटना और बदले की कार्रवाई रुकना। अगर पार्टी को चुनाव में जगह न मिली, तो लौटूंगी ही नहीं।

शेख हसीना को फांसी की सजा के बाद विकल्प क्या?

कानूनी तौर पर हसीना ऊपरी अदालत में अपील कर सकती हैं—सबूतों की दोबारा जांच या अनुचित ट्रायल का दावा। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों से शिकायत भी रास्ता है, जो दबाव तो बना सकते हैं। राजनीतिक रूप से भारत या अन्य देशों से शरण मांगना, अवामी लीग के जरिए जन समर्थन जुटाना या यूनुस सरकार पर समझौते का दबाव—ये सब खुले हैं।

UN और ICC की भूमिका सीमित क्यों?

संयुक्त राष्ट्र फैसला रद्द नहीं कर सकता, लेकिन मानवाधिकार उल्लंघन की जांच या ICC रेफरल कर सकता है। हसीना ICC के लिए तैयार हैं। अगर वहां गड़बड़ी साबित हुई, तो भारत प्रत्यर्पण से इनकार का आधार मजबूत हो जाएगा।

यह मामला दक्षिण एशिया की राजनीति को नई दिशा दे रहा है। बांग्लादेश की अस्थिरता से भारत की सीमाओं पर नजर रखनी होगी—क्या तीसरा देश हसीना की नई मंजिल बनेगा या कूटनीतिक जंग लंबी चलेगी? अपडेट्स के लिए बने रहें।

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