नई दिल्ली। डॉलर के सामने रुपया कभी इतना कमजोर नहीं पड़ा था। सोमवार 30 मार्च को कारोबार के दौरान रुपया 95 के पार पहुंच गया और 95.22 के रिकॉर्ड निचले स्तर को छू लिया। हालांकि बाद में थोड़ी रिकवर हुई और यह 94.78 पर बंद हुआ, जो पिछले बंद भाव 94.85 से 7 पैसे मजबूत है। लेकिन यह आंकड़ा सिर्फ नंबर नहीं, बल्कि आम आदमी के लिए महंगाई का नया खतरा है।
ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच चल रही जंग ने ग्लोबल मार्केट को हिला दिया है। खाड़ी इलाके में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और भारत जैसे तेल आयातक देश पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है।
रुपए में गिरावट की सबसे बड़ी वजह क्या है?
इसकी सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में उछाल है। ईरान के हमलों के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमतें 115 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गई हैं। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत तेल विदेश से मंगाता है और भुगतान डॉलर में करना पड़ता है।
तेल महंगा होने से डॉलर की मांग अचानक बढ़ गई, जिससे रुपए पर भारी दबाव पड़ा। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से दुनिया का 20 प्रतिशत और भारत का आधा तेल गुजरता है। अगर यहां सप्लाई बाधित हुई तो स्थिति और खराब हो सकती है।
इस वित्त वर्ष में रुपए की कितनी गिरावट?
एक महीने में रुपया करीब 4 प्रतिशत टूट चुका है। पूरे वित्त वर्ष में यह गिरावट 10 प्रतिशत से ज्यादा हो गई है। मार्च में ही विदेशी निवेशक (FIIs) ने शेयर बाजार से करीब 1.15 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए। युद्ध की अनिश्चितता के कारण निवेशक सुरक्षित अमेरिकी बॉन्ड्स की ओर भाग रहे हैं, जिससे भारतीय बाजारों पर अतिरिक्त दबाव बना है।
आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?
रुपया कमजोर होने का सीधा असर आपकी जेब पर पड़ेगा।
- पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे, जिससे ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा की चीजों की कीमत बढ़ेगी।
- मोबाइल, लैपटॉप, सोना-चांदी जैसे आयातित सामान महंगे हो जाएंगे।
- विदेश में पढ़ाई या यात्रा का खर्च बढ़ जाएगा।
- कुल मिलाकर महंगाई का नया दौर शुरू हो सकता है।
अर्थशास्त्री चेतावना दे रहे हैं कि ऊंची एनर्जी कीमतें भारत की जीडीपी ग्रोथ को भी नुकसान पहुंचा सकती हैं। ब्याज दरों में कटौती करना रिजर्व बैंक के लिए मुश्किल हो जाएगा।
करेंसी की कीमत तय कैसे होती है?
किसी भी देश की मुद्रा की कीमत मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी मांग और सप्लाई पर निर्भर करती है। अगर भारत को ज्यादा तेल या अन्य सामान आयात करना पड़े तो डॉलर की जरूरत बढ़ती है। डॉलर महंगा होता है तो रुपया कमजोर पड़ता है।
इसके अलावा देश की महंगाई, ब्याज दरें, आर्थिक स्थिरता और विदेशी निवेशकों का भरोसा भी अहम भूमिका निभाते हैं। फिलहाल युद्ध की वजह से अनिश्चितता बनी हुई है, इसलिए रुपए में अस्थिरता जारी रह सकती है।
रुपया 95 के पार पहुंचना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि बड़े आर्थिक बदलाव का संकेत है। सरकार और रिजर्व बैंक अब क्या कदम उठाते हैं, यह देखना होगा। अगर तेल की कीमतें नियंत्रण में आईं तो रुपया संभल सकता है, वरना महंगाई का बोझ आम आदमी को और झेलना पड़ेगा।