मुकेश सहनी की राजनीतिक यात्रा: ‘देवदास’ के सेट बनाने वाले ‘सन ऑफ मल्लाह’ की कहानी, 15 सीटों पर हार के बाद कहां जाएगी नाव?

📰 मुकेश सहनी: ‘देवदास’ के शीशे से चमकी किस्मत, अब राजनीति की उथल-पुथल में डगमगाई ‘नाव’

एक नाव जो संघर्षों के समंदर को पार करते-करते सत्ता के तूफान में फंस गई। एक ऐसा शख्स जिसने मुंबई की फिल्मी दुनिया में शीशे के सेट बनाकर अपनी किस्मत चमकाई और फिर बिहार की राजनीति में ‘मल्लाह पुत्र’ बनकर तूफान लाने की कोशिश की।

मुकेश सहनी की राजनीतिक यात्रा उतार-चढ़ाव, महत्वाकांक्षाओं और राजनीतिक उथल-पुथल की एक ऐसी दास्तान है, जिसका अंत अभी नहीं लिखा गया है। 2025 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की पूरी हार ने एक नए सवाल को जन्म दिया है – क्या अब खत्म होगा ‘सन ऑफ मल्लाह’ का सफर?

🚀 मुंबई के फुटपाथ से निकली जिंदगी की पटकथा

मुकेश सहनी की कहानी रातोंरात सफल होने वाली कहानी नहीं है। साल 1999 का वक्त था। 18 साल के मुकेश अपने बचपन के दोस्त धुरन सहनी के साथ घर से भागकर मुंबई पहुंचे थे। पढ़ाई केवल 8वीं कक्षा तक हुई थी और परिवार की आर्थिक मजबूरियों ने रोजी-रोटी की तलाश में घर से निकलने पर मजबूर कर दिया .

मुंबई पहुंचने पर पहला काम मिला एक कॉस्मेटिक दुकान पर, जहां महज 900 रुपए महीने पर काम करना पड़ा। कुछ समय बाद उन्होंने सड़क किनारे बैग बेचने का भी प्रयास किया, लेकिन ज्यादा सफलता नहीं मिली। वह फिर से उसी कॉस्मेटिक दुकान पर लौट आए।

यहीं उनकी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। दुकान के ठीक बगल में एक ऐसी दुकान थी जो कांच का फ्रेम बनाती थी और फिल्मों के लिए सेट भी तैयार करती थी। एक दिन कारीगरों के न मिलने पर मुकेश को फिल्म शूटिंग के लिए कांच का काम देखने भेजा गया। यही वह पल था जब उन्हें अपनी किस्मत की एक नई रोशनी दिखाई दी।

🎬 ‘देवदास’ का जादू: मुंबई में बदली तकदीर

धीरे-धीरे मुकेश सहनी ने कांच से फ्रेमिंग करने और फिल्मों में सेट सजाने का काम शुरू किया। इस दौरान उनका फिल्म इंडस्ट्री में संपर्क बढ़ता गया। पहले उन्हें फिल्म सेटों पर छोटा-मोटा काम मिला, लेकिन जल्द ही उन्हें बड़ा ब्रेक मिला शाहरुख खान की फिल्म ‘देवदास’ के लिए शीशे का सेट बनाने का काम। इस प्रोजेक्ट ने उनकी किस्मत पलट दी। ‘देवदास’ के बाद उन्हें महल और शीशे से खूबसूरत सेट बनाने के काम मिलने लगे, जिससे अच्छी आमदनी होनी शुरू हो गई।

इस सफलता के बाद मुकेश सहनी ने अपनी खुद की कंपनी ‘मुकेश फिल्म वर्क्स प्राइवेट लिमिटेड’ (बाद में ‘मुकेश सिने वर्ल्ड’) की स्थापना की। वह टीवी-सीरियल, फिल्मों, विज्ञापनों और इवेंट के लिए सेट बनाने के ठेके लेने लगे। ‘बिग बॉस’ जैसे टीवी शो और सलमान खान की फिल्म ‘प्रेम रतन धन पायो’ व ‘बजरंगी भाईजान’ के सेट उनकी कामयाबी की कहानी कहते हैं।

🗳️ राजनीति के पाने में उतरी ‘नाव’

मुंबई में सफलता हासिल करने के बाद मुकेश सहनी ने अपने समाज की सेवा का रास्ता चुना। साल 2015 में उन्होंने ‘निषाद विकास संघ’ की स्थापना की और मल्लाह समाज को आरक्षण दिलाने की मांग को लेकर आवाज बुलंद की। 2014 में दरभंगा के राज मैदान में आयोजित निषाद समाज सम्मेलन में हजारों लोगों ने शिरकत की और मुकेश सहनी को ‘मल्लाह पुत्र’ के नाम से पुकारा गया। इसके बाद उन्होंने ‘सन ऑफ मल्लाह’ के नाम से अखबारों में विज्ञापन भी छपवाए।

मुकेश सहनी ने 4 नवंबर 2018 को अपनी राजनीतिक पार्टी ‘विकासशील इंसान पार्टी’ (VIP) का पंजीकरण कराया। 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने महागठबंधन के साथ 3 सीटों (मधुबनी, मुजफ्फरपुर और खगड़िया) से चुनाव लड़ा, लेकिन तीनों जगह हार का सामना करना पड़ा।

2020 के विधानसभा चुनाव में वह एनडीए में शामिल हो गए और उन्हें 11 सीटें मिलीं। इस चुनाव में VIP ने 4 सीटें जीतीं, हालांकि मुकेश स्वयं सिमरी बख्तियारपुर से चुनाव हार गए। उस समय उन्हें महागठबंधन की ओर से डिप्टी सीएम का ऑफर मिला था, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था।

💥 2025 चुनाव: जहां डगमगाई मुकेश सहनी की राजनीतिक यात्रा

मुकेश सहनी की राजनीतिक यात्रा का सबसे निर्णायक और चौंकाने वाला अध्याय 2025 के विधानसभा चुनाव में लिखा गया। इस चुनाव में मुकेश सहनी ने महागठबंधन से 60 सीटें और डिप्टी सीएम पद की मांग की। कई दौर की वार्ताओं के बाद अंततः उन्हें 15 सीटें मिलीं और महागठबंधन ने आधिकारिक तौर पर उन्हें डिप्टी सीएम का चेहरा घोषित किया। लेकिन चुनावी नतीजे उनके लिए बेहद निराशाजनक रहे।

VIP पार्टी की सभी 15 सीटों पर हार हुई और उन्हें महज 1.37% वोट ही मिल सके, जबकि बिहार की आबादी में मल्लाह जाति की हिस्सेदारी लगभग 2.6% है। इस हार ने राजनीतिक विश्लेषकों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि क्या मुकेश सहनी की महत्वाकांक्षाएं उनकी जमीनी पकड़ से आगे निकल गईं। चुनावी नतीजे के बाद कहा जा रहा है कि ज्यादा पाने की चाहत में उनकी नाव (जो VIP पार्टी का चुनाव चिह्न है) डूब गई।

🧭 भविष्य का रास्ता: क्या संभाल पाएंगे ‘मल्लाह पुत्र’ की नाव?

मुकेश सहनी की कहानी भारतीय लोकतंत्र की उस जटिल राह को दर्शाती है जहां सामाजिक न्याय की राजनीति और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं अक्सर टकराती हैं। एक तरफ वह अपने समाज के हक की लड़ाई लड़ने का दावा करते हैं, तो दूसरी तरफ चुनावी हार उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता पर सवाल खड़े करती है।

बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम सामने आने के बाद ऐसा कहा जा रहा है कि ‘जिस निषाद जाति की राजनीति मुकेश सहनी कर रहे हैं, वह कहीं न कहीं भारतीय जनता पार्टी के साथ है।’ मुकेश को अभी और अपने समाज मे पैठ बनानी पड़ेगी तभी समाज उन्हें ‘सन ऑफ मल्लाह’ कहेगा।

मुकेश सहनी की राजनीतिक यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है, लेकिन 2025 की हार ने इसमें एक गहरा संकट पैदा कर दिया है। अब देखना यह है कि क्या वह इस हार से सबक लेकर फिर से अपनी राजनीतिक नाव को पार लगा पाएंगे, या फिर बिहार की उथल-पुथल भरी राजनीति में यह नाव डूबती चली जाएगी। आने वाले वक्त में यही सवाल बिहार की राजनीति का एक अहम मोड़ तय करेगा।

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